31 मार्च से हिरासत में चल रहे कर्मी को मिली जमानत, सर्विस बुक से जुड़ी अनियमितता का था मामला

पटना: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए सर्विस बुक में हेराफेरी और अनियमितता के मामले में लंबे समय से न्यायिक हिरासत में बंद एक सरकारी कर्मी को जमानत प्रदान की है। याचिकाकर्ता, जो गत 31 मार्च से जेल में बंद था, को कोर्ट से राहत मिलने के बाद अब उसकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। हाईकोर्ट के इस निर्णय को कानूनी हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, विशेषकर उन मामलों में जहां विभागीय अनियमितताओं को आपराधिक रंग दिया जाता है।

क्या था पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित कर्मी पर यह आरोप था कि उसने अपने सरकारी सर्विस बुक में तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की है। मामले में विभागीय जांच के साथ-साथ पुलिस में प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज कराई गई थी। आरोप के आधार पर कर्मी को गत 31 मार्च को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। तब से वह लगातार जेल में था और निचली अदालत से उसकी जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी।

कोर्ट में हुई दलीलें

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को साजिश के तहत फंसाया गया है। दलील दी गई कि सर्विस बुक में जो भी त्रुटियां या विसंगतियां पाई गई हैं, वे मानवीय भूल का परिणाम हो सकती हैं, न कि कोई सोची-समझी आपराधिक साजिश। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि मामले में आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया जा चुका है और अब कर्मी की जेल में रहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जांच में सहयोग करने के लिए वह पूरी तरह तैयार है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी गंभीर मामला है। यदि ऐसे मामलों में आरोपियों को बेल दी जाती है, तो इससे विभागीय अनुशासन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

न्यायालय का रुख

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पटना हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और याचिकाकर्ता की हिरासत की अवधि पर विचार किया। न्यायालय ने इस बात को संज्ञान में लिया कि आरोपी पिछले कई महीनों से (31 मार्च से) जेल में है और मामले की सुनवाई में समय लग सकता है।

अदालत ने सख्त शर्तों के साथ जमानत मंजूर की। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जमानतदार पेश करने के साथ ही याचिकाकर्ता को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह भविष्य में विभागीय जांच में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा और न ही साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ करेगा। साथ ही, उसे नियमित रूप से संबंधित थाना में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

महत्वपूर्ण संदेश

इस आदेश के बाद कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन कर्मियों के लिए एक नजीर बन सकता है जो विभागीय अनियमितताओं के मामलों में लंबे समय से जेल में बंद हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जमानत मिलना दोषमुक्ति नहीं है। मामले का ट्रायल कानून के अनुसार चलेगा और याचिकाकर्ता को सुनवाई की हर तारीख पर अदालत में उपस्थित रहना होगा।

इस राहत भरी खबर के बाद याचिकाकर्ता के परिजनों ने खुशी जाहिर की है और कानूनी प्रक्रिया के प्रति विश्वास जताया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में आगे कोई और विभागीय कार्रवाई की जाएगी या मामला सामान्य प्रक्रिया से सुलझ जाएगा।