डीएम अंशुल कुमार ने 12,851 स्क्रीनिंग की उपलब्धि को सराहा, महादलित टोलों पर विशेष फोकस के निर्देश

पूर्णिया: क्षय रोग (TB) जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के खिलाफ चलाई जा रही राष्ट्रीय मुहिम को जिले की जमीनी हकीकत पर मुस्तैदी से उतारने के लिए पूर्णिया जिला प्रशासन पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रहा है। इसी कड़ी में समाहरणालय सभागार में पूर्णिया के जिलाधिकारी (DM) अंशुल कुमार की अध्यक्षता में स्वास्थ्य विभाग और जिला क्षय रोग नियंत्रण केंद्र के अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जिले में चल रहे टीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा करना, स्वास्थ्य लक्ष्यों की प्राप्ति का आकलन करना और भावी रणनीतियों को धार देना था।

समीक्षा बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग द्वारा अब तक हासिल की गई उपलब्धियों पर संतोष व्यक्त किया। विशेष रूप से, जिले में निर्धारित लक्ष्यों को पार करते हुए 12,851 संभावित मरीजों की स्क्रीनिंग (Screening) किए जाने की शानदार उपलब्धि की डीएम ने खुलकर सराहना की। उन्होंने स्वास्थ्य कर्मियों और चिकित्सा अधिकारियों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि इसी समर्पण भाव के साथ काम करने पर पूर्णिया को जल्द ही टीबी-मुक्त जिलों की श्रेणी में खड़ा किया जा सकता है।

लक्ष्य बनाम उपलब्धि: आंकड़ों की जुबानी प्रगति

पूर्णिया जिले को स्वास्थ्य विभाग द्वारा टीबी की रोकथाम और पहचान के लिए कड़े लक्ष्य सौंपे गए थे। जिलाधिकारी अंशुल कुमार ने जब इन आंकड़ों की समीक्षा की, तो प्रशासन की सक्रियता और जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य कर्मियों की मेहनत साफ नजर आई:

टीबी स्क्रीनिंग का लक्ष्य: जिले के लिए 12,719 लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

वास्तविक उपलब्धि: प्रशासनिक और चिकित्सीय टीमों के अथक प्रयासों से इस लक्ष्य को पीछे छोड़ते हुए कुल 12,851 लोगों की सफल स्क्रीनिंग की गई। यह निर्धारित लक्ष्य से अधिक है, जो यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य महकमा किस हद तक सक्रिय है।

एक्स-रे का लक्ष्य: मरीजों की सटीक पहचान और फेफड़ों की स्थिति का आकलन करने के लिए 1,400 एक्स-रे करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसकी प्रगति रिपोर्ट पर भी बैठक में विस्तार से चर्चा की गई।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आंकड़े सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं होने चाहिए, बल्कि इनका सीधा असर धरातल पर दिखना चाहिए ताकि एक भी टीबी का वास्तविक मरीज इलाज से वंचित न रहे।

महादलित टोलों और दूरदराज के क्षेत्रों पर विशेष जोर

समीक्षा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा वह निर्देश रहा, जो जिलाधिकारी ने जिले के सभी चिकित्सकों और मेडिकल ऑफिसर्स को दिया। डीएम अंशुल कुमार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि चिकित्सा व्यवस्था केवल शहरी इलाकों या अस्पतालों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसकी पहुंच समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक होनी चाहिए।

"स्वास्थ्य सेवाओं का वास्तविक पैमाना यह है कि वे उन तक पहुंचें जिन्हें उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है। हमारे महादलित टोलों और उपेक्षित बस्तियों में जागरूकता और जांच का स्तर बढ़ाने के लिए चिकित्सकों को खुद आगे आना होगा।" — जिलाधिकारी अंशुल कुमार

घर-घर और टोला-वार अभियान: डीएम ने सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के महादलित टोलों, घुमंतू जातियों के डेरों और घनी आबादी वाली गरीब बस्तियों में विशेष स्वास्थ्य शिविर (Health Camps) आयोजित करें।

लक्षणों की पहचान और तुरंत जांच: इन टोलों में रहने वाले लोगों में कुपोषण और जागरूकता के अभाव के कारण टीबी के लक्षण आसानी से छिप जाते हैं। चिकित्सा टीमों को निर्देश दिया गया कि वे इन इलाकों में जाकर बलगम के सैंपल और मौके पर लक्षणों की जांच सुनिश्चित करें।

सामुदायिक सहभागिता: आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी सेविकाओं की मदद से महादलित टोलों में चौपाल लगाकर टीबी के लक्षणों (जैसे दो हफ्ते से अधिक खांसी, बलगम में खून, वजन का घटना और रात में पसीना आना) के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए।

निक्षय पोषण योजना और समयबद्ध इलाज की मॉनिटरिंग

टीबी के मरीजों को केवल दवाइयां देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इलाज के दौरान उनके पोषण और मानसिक संबल का ध्यान रखना भी राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) का अहम हिस्सा है। बैठक के दौरान डीएम ने इस बात की भी समीक्षा की कि क्या सभी रजिस्टर्ड मरीजों को समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है।

निक्षय पोषण योजना: टीबी के प्रत्येक मरीज को इलाज के दौरान पौष्टिक आहार के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता राशि (प्रति माह 500 रुपये) सीधे उनके बैंक खातों में बिना किसी विलंब के पहुंचनी चाहिए। डीएम ने जिला स्वास्थ्य समिति को निर्देश दिया कि लंबित मामलों का तुरंत निष्पादन किया जाए।

दवाइयों की निरंतरता (Adherence): मरीजों द्वारा नियमित रूप से दवा का सेवन (DOTS प्रणाली) सुनिश्चित करने की सख्त मॉनिटरिंग की जाए। यदि कोई मरीज बीच में दवा छोड़ता है, तो स्वास्थ्य कर्मी तुरंत उसके घर जाकर उसकी काउंसलिंग करें।

निजी अस्पतालों की सहभागिता: जिले में कार्यरत निजी चिकित्सकों (Private Practitioners) को भी यह निर्देशित किया गया है कि वे अपने यहां आने वाले किसी भी टीबी मरीज की अनिवार्य रूप से स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल पर सूचना दें, ताकि सरकारी स्तर पर उनका ट्रैक रखा जा सके।

स्वास्थ्य अधिकारियों को सख्त निर्देश और कार्ययोजना

जिलाधिकारी ने बैठक के अंत में सभी चिकित्सा अधिकारियों और ब्लॉक स्तर के नोडल अधिकारियों को आगामी महीनों के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना (Action Plan) सौंपी:

गुणवत्तापूर्ण जांच: केवल संख्या बढ़ाने पर जोर न देकर स्क्रीनिंग की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर बल दिया गया, ताकि ट्रू-नॉट (Truenat) और सी-नॉट (CBNAAT) जैसी आधुनिक मशीनों का अधिकतम उपयोग किया जा सके।

सक्रिय केस खोज (ACF - Active Case Finding): उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सक्रिय रूप से मामलों की खोज करने के लिए विशेष टीमों का गठन किया जाए।

समय पर रिपोर्टिंग: सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) अपने क्षेत्र के डेटा को समय पर जिला मुख्यालय को प्रेषित करें, ताकि किसी भी प्रकार की कमी को तुरंत सुधारा जा सके।

पूर्णिया के जिलाधिकारी अंशुल कुमार द्वारा बुलाई गई यह टीबी कार्यक्रम की समीक्षा बैठक और 12,851 स्क्रीनिंग की उपलब्धि यह साबित करती है कि जिला प्रशासन जनस्वास्थ्य के मुद्दों पर बेहद गंभीर और परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) दृष्टिकोण अपना रहा है। महादलित टोलों तक चिकित्सकों को भेजने और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को सघन बनाने का यह निर्देश यदि पूरी ईमानदारी से लागू किया जाता है, तो पूर्णिया जिला न केवल टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्यों को समय से पहले हासिल कर लेगा, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्ग के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का एक मजबूत कवच भी तैयार होगा।