टीआरई-4 शिक्षक भर्ती में मैथिली की अनदेखी पर एमएसयू का विरोध, सरकार से भाषा को शामिल करने की मांग
दरभंगा। बिहार सरकार द्वारा प्रस्तावित टीआरई-4 (Teacher Recruitment Examination-4) शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में मैथिली भाषा को कथित रूप से पर्याप्त स्थान नहीं दिए जाने के विरोध में मिथिला स्टूडेंट यूनियन (एमएसयू) ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संगठन ने इसे मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की उपेक्षा बताते हुए सरकार से जल्द निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
एमएसयू के नेताओं ने कहा कि मैथिली भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल एक मान्यता प्राप्त भाषा है और इसका समृद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक इतिहास रहा है। ऐसे में शिक्षक भर्ती जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में इसे उचित स्थान नहीं दिया जाना लाखों मैथिली भाषियों की भावनाओं को आहत करने वाला कदम है।
सरकार के निर्णय पर उठाए सवाल
एमएसयू के प्रतिनिधियों ने कहा कि बिहार सरकार लगातार मातृभाषा आधारित शिक्षा और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण की बात करती रही है, लेकिन टीआरई-4 भर्ती प्रक्रिया में मैथिली को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने से सरकार की कथनी और करनी में अंतर दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि यदि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को स्वीकार किया गया है, तो शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में भी संबंधित भाषा के योग्य अभ्यर्थियों को अवसर मिलना चाहिए।
मैथिली भाषा के सम्मान का मुद्दा
संगठन ने कहा कि यह केवल रोजगार का विषय नहीं है, बल्कि मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति के सम्मान से जुड़ा मुद्दा भी है। मैथिली भाषा बोलने और पढ़ने वाले लाखों लोग वर्षों से इसकी शैक्षणिक और प्रशासनिक उपयोगिता बढ़ाने की मांग करते रहे हैं।
एमएसयू नेताओं का कहना है कि यदि शिक्षक भर्ती में मैथिली विषय के शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति नहीं होगी, तो विद्यालयों में इस भाषा के अध्ययन और शिक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
संविधान से मिली है मान्यता
संगठन ने याद दिलाया कि मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा चुका है। इसके बाद से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षणिक संस्थानों में इसे स्थान दिया जाता रहा है।
एमएसयू का कहना है कि संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए ताकि भाषा के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास मजबूत हो सकें।
छात्रों और अभ्यर्थियों की चिंता
टीआरई-4 की तैयारी कर रहे कई अभ्यर्थियों ने भी संगठन की मांग का समर्थन किया। उनका कहना है कि यदि मैथिली विषय को पर्याप्त अवसर नहीं मिलेगा, तो वर्षों से इस विषय की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों और प्रशिक्षित अभ्यर्थियों के रोजगार के अवसर सीमित हो जाएंगे।
उन्होंने सरकार से पारदर्शी और संतुलित भर्ती नीति अपनाने की अपील की।
शिक्षा विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) भी प्रारंभिक शिक्षा में स्थानीय और मातृभाषाओं के उपयोग पर जोर देती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विद्यालयों में मैथिली पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक नियुक्त किए जाते हैं, तो विद्यार्थियों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ने का बेहतर अवसर मिलेगा।
एमएसयू ने दी आंदोलन की चेतावनी
एमएसयू ने कहा कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो संगठन लोकतांत्रिक तरीके से चरणबद्ध आंदोलन शुरू करेगा। इसके तहत ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन और जनजागरण अभियान चलाए जाएंगे।
संगठन ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव नहीं, बल्कि मैथिली भाषा के अधिकार और सम्मान की रक्षा करना है।
सरकार से प्रमुख मांगें
एमएसयू ने सरकार के समक्ष कई मांगें रखीं, जिनमें प्रमुख हैं—
टीआरई-4 शिक्षक भर्ती में मैथिली भाषा को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।
मैथिली विषय के लिए पर्याप्त संख्या में पद सृजित किए जाएं।
योग्य अभ्यर्थियों को समान अवसर सुनिश्चित किया जाए।
स्थानीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए।
मिथिला क्षेत्र के विद्यालयों में मैथिली शिक्षकों की नियुक्ति बढ़ाई जाए।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी क्षेत्र की भाषा उसकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार होती है। मैथिली केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि साहित्य, लोककला, संगीत और सांस्कृतिक विरासत की वाहक भी है।
ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में मैथिली को उचित स्थान मिलना सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी निगाहें
फिलहाल एमएसयू की मांगों के बाद सभी की निगाहें बिहार सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। अभ्यर्थियों और मैथिली भाषियों को उम्मीद है कि सरकार उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षक भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा करेगी और आवश्यक संशोधन पर विचार करेगी।
यदि सरकार सकारात्मक निर्णय लेती है, तो इससे न केवल मैथिली भाषा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि मातृभाषा आधारित शिक्षा को भी मजबूती मिलेगी। वहीं यदि मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में व्यापक जनआंदोलन का रूप भी ले सकता है।