बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों को मिलेगा विश्वस्तरीय स्वरूप, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और संरक्षण के निर्देश
पटना। बिहार की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि राज्य के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए और उनके संरक्षण, विकास तथा पर्यटन की दृष्टि से समग्र कार्ययोजना तैयार की जाए। मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से सुल्तानगंज, बोधगया, राजगीर, नालंदा, वैशाली, विक्रमशिला, रोहतासगढ़ किला और अन्य महत्वपूर्ण विरासत स्थलों पर प्राथमिकता के आधार पर कार्य शुरू करने का निर्देश दिया है।
मुख्यमंत्री का कहना है कि बिहार केवल इतिहास का केंद्र नहीं बल्कि विश्व सभ्यता की महत्वपूर्ण धरोहर है। यहां मौजूद बौद्ध, जैन, हिंदू और प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़े अनेक स्थल पूरी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। इसके लिए आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक संरक्षण और बेहतर पर्यटन सुविधाओं का विकास आवश्यक है।
वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर रहेगा विशेष जोर
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सभी प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का आधुनिक तकनीकों की सहायता से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए। इस प्रक्रिया में संरचनाओं की वास्तविक स्थिति, उनकी मजबूती, क्षति के कारण, संरक्षण की आवश्यकता तथा भविष्य की मरम्मत और विकास योजनाओं का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होगा कि किन स्मारकों को तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है और किन स्थलों को पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जा सकता है।
सुल्तानगंज और बोधगया होंगे प्राथमिकता में
मुख्यमंत्री ने भागलपुर जिले के सुल्तानगंज और गया जिले के बोधगया को विशेष प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है। सुल्तानगंज सावन महीने में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां से कांवर यात्रा की शुरुआत होती है। वहीं बोधगया भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति का स्थल होने के कारण अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।
सरकार का उद्देश्य इन दोनों स्थानों पर विश्वस्तरीय आधारभूत सुविधाएं विकसित करना, पर्यटकों की सुविधा बढ़ाना और विरासत संरचनाओं का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित करना है।
विरासत संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग
सरकार ने संकेत दिए हैं कि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर 3-डी मैपिंग, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, लेजर स्कैनिंग, ड्रोन सर्वेक्षण और अन्य वैज्ञानिक तरीकों की सहायता ली जाएगी ताकि स्मारकों की वास्तविक स्थिति का सटीक आकलन किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक से संरक्षण कार्य अधिक प्रभावी होगा और ऐतिहासिक संरचनाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।
पर्यटन को मिलेगा नया विस्तार
राज्य सरकार का मानना है कि यदि ऐतिहासिक धरोहरों का समुचित विकास किया जाए तो बिहार देश और दुनिया के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में शामिल हो सकता है। इसके लिए सड़क, पार्किंग, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, डिजिटल सूचना प्रणाली, गाइड सुविधा, सुरक्षा और पर्यटक केंद्रों का विकास भी योजना का हिस्सा होगा।
पर्यटन विभाग को निर्देश दिया गया है कि धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन को एकीकृत करते हुए नई पर्यटन सर्किट योजना तैयार की जाए, जिससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को बेहतर अनुभव मिल सके।
स्थानीय लोगों को मिलेगा रोजगार
सरकार का मानना है कि धरोहर स्थलों के विकास से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी। होटल, रेस्तरां, हस्तशिल्प, परिवहन, गाइड सेवा, स्थानीय उत्पादों की बिक्री और अन्य पर्यटन आधारित गतिविधियों के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है।
विशेष रूप से युवाओं को पर्यटन गाइड, आतिथ्य सेवा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जोड़ने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।
विभिन्न विभाग मिलकर करेंगे कार्य
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को केवल एक विभाग तक सीमित नहीं रखा जाएगा। पर्यटन विभाग, कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, भवन निर्माण विभाग, पथ निर्माण विभाग, वन एवं पर्यावरण विभाग, नगर विकास विभाग तथा जिला प्रशासन आपसी समन्वय के साथ कार्य करेंगे।
इसके अलावा पुरातत्व विशेषज्ञों, संरक्षण वास्तुकारों और शोध संस्थानों का सहयोग भी लिया जाएगा ताकि विकास कार्य ऐतिहासिक महत्व को प्रभावित किए बिना किए जा सकें।
विश्व धरोहर स्थलों पर विशेष फोकस
बिहार में पहले से मौजूद विश्व प्रसिद्ध धरोहरों और अंतरराष्ट्रीय महत्व के स्थलों को और बेहतर बनाने की दिशा में भी कार्य किया जाएगा। बोधगया, नालंदा और अन्य ऐतिहासिक परिसरों में पर्यटक सुविधाओं का विस्तार, स्वच्छता, डिजिटल जानकारी, बहुभाषी सूचना प्रणाली और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में बिहार की पहचान केवल ऐतिहासिक राज्य के रूप में नहीं बल्कि विश्वस्तरीय विरासत पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित हो।
विशेषज्ञों ने निर्णय का किया स्वागत
इतिहासकारों, पर्यटन विशेषज्ञों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े जानकारों ने मुख्यमंत्री के इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि लंबे समय से बिहार की अनेक महत्वपूर्ण धरोहरों को व्यवस्थित संरक्षण और आधुनिक सुविधाओं की आवश्यकता थी। यदि वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण और संरक्षण किया जाता है तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इन ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि संरक्षण कार्य के दौरान स्मारकों की मौलिकता और ऐतिहासिक स्वरूप को किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
केंद्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी संभावना
सरकार भविष्य में आवश्यकता के अनुसार केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), यूनेस्को तथा अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं के साथ भी समन्वय स्थापित कर सकती है। इससे तकनीकी विशेषज्ञता, संरक्षण की आधुनिक पद्धतियों और वैश्विक स्तर के पर्यटन विकास का लाभ बिहार को मिल सकता है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, संरक्षण और विश्वस्तरीय विकास के दिए गए निर्देश राज्य के सांस्कृतिक और पर्यटन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण पहल माने जा रहे हैं। यदि योजनाओं को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाता है तो सुल्तानगंज, बोधगया, नालंदा, राजगीर, वैशाली, विक्रमशिला और अन्य ऐतिहासिक स्थल न केवल अपनी प्राचीन विरासत को सुरक्षित रख पाएंगे, बल्कि विश्व पर्यटन मानचित्र पर बिहार की पहचान को भी नई ऊंचाई देंगे। इसके साथ ही स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सकेगी।