अनुकंपा नियुक्ति प्रक्रिया में एक ही अभ्यर्थी को पहले चतुर्थ और फिर तृतीय वर्ग में नियुक्ति का मामला उजागर;
भागलपुर, विशेष संवाददाता: तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) और उससे जुड़े प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों अनुकंपा के आधार पर हुई एक अजीबोगरीब नियुक्ति चर्चा का विषय बनी हुई है। अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के नियमों को ताक पर रखकर एक ही अभ्यर्थी को पहले चतुर्थ श्रेणी (Grade IV) के पद पर और उसके कुछ ही समय बाद तृतीय वर्ग (Grade III) के पद पर नियुक्त किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस मामले के उजागर होने के बाद से विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है, और यह सवाल उठ रहा है कि क्या एक ही व्यक्ति को नियमों के विपरीत दो बार अनुकंपा का लाभ दिया जा सकता है। इस पूरी गड़बड़ी को लेकर शिक्षाविदों और कर्मचारियों के बीच गहरी नाराजगी है, और अब इस पर उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला? अनुकंपा के नियमों की पेचीदगियां
सरकारी प्रावधानों और सामान्य प्रशासन विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी सरकारी सेवक की मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार के केवल एक ही सदस्य को उसकी योग्यता के आधार पर एक बार अनुकंपा पर नौकरी दिए जाने का प्रावधान है:
पहले चतुर्थ वर्ग में नियुक्ति: प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक दिवंगत कर्मचारी के आश्रित परिजन को पहले नियमों के तहत चतुर्थ वर्ग (लिपिक या चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी) के पद पर नौकरी दी गई थी। संबंधित अभ्यर्थी ने उस पद पर अपनी सेवाएं भी शुरू कर दी थीं।
फिर तृतीय वर्ग में समायोजन/नियुक्ति: हैरानी की बात यह है कि कुछ समय बीतने के बाद उसी अभ्यर्थी को नियमों में फेरबदल कर या कथित तौर पर मिलीभगत के जरिए उच्चतर योग्यता का लाभ देते हुए तृतीय वर्ग (Assistant/Clerk) के पद पर पुनः नियुक्त कर दिया गया। एक ही व्यक्ति द्वारा दो अलग-अलग वर्गों में अनुकंपा का लाभ उठाने की इस प्रक्रिया ने विश्वविद्यालय की नियुक्ति शाखा की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
विश्वविद्यालय के नियमों और राजभवन के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन
शैक्षणिक और प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य किसी दिवंगत कर्मी के परिवार को अचानक आई आर्थिक तंगी से तत्काल उबारना होता है, न कि किसी व्यक्ति को एक के बाद एक बेहतर पदों पर प्रमोट करने का जरिया बनाना:
एक व्यक्ति, एक नौकरी का सिद्धांत: नियमों के मुताबिक, यदि किसी आश्रित को एक बार अनुकंपा पर नौकरी मिल जाती है, तो उसका मामला वहीं समाप्त हो जाता है। इसके बाद यदि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाना चाहता है, तो उसे अन्य सामान्य अभ्यर्थियों की तरह खुली प्रतियोगी परीक्षाओं या विभागीय प्रमोशन के जरिए आगे बढ़ना होता है।
दस्तावेजों और फाइलों की लीपापोती: आरोप लगाया जा रहा है कि इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय के कुछेक भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलकर फाइलों में इस तरह हेरफेर किया कि पहली नियुक्ति के तथ्यों को या तो दबा दिया गया या उसमें तकनीकी संशोधन कर दिया गया।
प्रशासनिक हलकों में सुगबुगाहट और जांच की मांग
जब से यह मामला मीडिया और विश्वविद्यालय के सुधी जनों के संज्ञान में आया है, तब से प्रशासनिक गलियारों में खलबली मची हुई है:
कर्मचारी संघों का विरोध: विभिन्न कर्मचारी संगठनों और छात्र नेताओं ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि एक तरफ जहाँ सैंकड़ों योग्य युवा वर्षों से नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं, वहीं कुछ खास लोगों को नियमों को ताक पर रखकर दोहरा लाभ दिया जा रहा है।
कुलपति और उच्च अधिकारियों की नजर: सूत्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों तक यह मामला पहुँच चुका है। इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई है कि इस पूरी प्रक्रिया की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी, ताकि यह पता चल सके कि किस सक्षम प्राधिकारी की संस्तुति या हस्ताक्षर से यह अवैध प्रक्रिया पूरी की गई।
भागलपुर विश्वविद्यालय में अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर हुए इस कथित खेल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी किस हद तक हावी है। एक ही अभ्यर्थी को पहले चतुर्थ और फिर तृतीय वर्ग में नौकरी देना न केवल सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि उन तमाम जरूरतमंदों के अधिकारों पर डाका डालना है जो वास्तव में इस सहायता के हकदार हैं। यदि इस मामले में प्रशासन ने जल्द ही कड़ी कार्रवाई नहीं की, तो यह विश्वविद्यालय की साख पर एक और बड़ा धब्बा साबित होगा।