मायागंज अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलती तस्वीर; अल्ट्रासाउंड कराने आई महिलाओं को उठानी पड़ रही भारी दुश्वारियां, रजिस्ट्रेशन से लेकर लंबी कतारों तक प्रशासनिक उदासीनता का शिकार हो रहीं मरीज

भागलपुर, मुख्य संवाददाता: बिहार के भागलपुर जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल—जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (JLNMCH), जिसे स्थानीय रूप से 'मायागंज अस्पताल' के नाम से जाना जाता है—की व्यवस्थाएं एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में हैं। एक तरफ जहां सरकार राज्यभर के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं को अत्याधुनिक और सुगम बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। अस्पताल में विशेष रूप से अपनी जांच कराने पहुँचने वाली गर्भवती और अन्य महिला मरीजों को भारी कुव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ रहा है। अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) जैसी बेहद जरूरी जांच के लिए महिलाओं को सुबह से लेकर शाम तक रजिस्ट्रेशन काउंटर और जांच कमरों के बाहर अंतहीन लंबी कतारों में धक्के खाने पड़ते हैं, जिससे मरीजों का दर्द और अधिक बढ़ जाता है।

क्या है पूरा मामला? अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर का अमानवीय दृश्य

मायागंज अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग और महिला वार्ड के बाहर इन दिनों रोजाना सुबह से ही एक बेहद दर्दनाक और अव्यवस्था से भरा नजारा देखने को मिलता है। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों (जैसे बांका, कटिहार, पुर्णिया, गोड्डा और भागलपुर के विभिन्न प्रखंडों) से आने वाली सैकड़ों महिलाएं, जिनमें भारी संख्या में गर्भवती महिलाएं भी शामिल होती हैं, पेट में पल रहे बच्चे की स्थिति या अन्य गंभीर बीमारियों की जांच कराने के लिए अल्ट्रासाउंड करवाने पहुँचती हैं।

लेकिन अस्पताल पहुँचने के बाद उनके संघर्ष की जो दास्तान शुरू होती है, वह स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता को उजागर कर देती है:

लंबी और अनियंत्रित कतारें: महिलाओं को पर्चा कटाने और अल्ट्रासाउंड की बारी आने के लिए सुबह सूरज निकलने से पहले ही लंबी लाइनों में खड़े होना पड़ता है। कई बार तो घंटों कतार में खड़े रहने के बावजूद जब डॉक्टर का समय समाप्त हो जाता है, तो उन्हें बिना जांच के ही अगले दिन के लिए वापस लौटा दिया जाता है।

रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की जटिलता: ऑनलाइन और ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन के बीच समन्वय की कमी के कारण मरीजों को काउंटर पर भारी जद्दोजहद करनी पड़ती है। टोकन सिस्टम दुरुस्त न होने के कारण अक्सर कतार में धक्का-मुक्की और विवाद की स्थिति बन जाती है।

बैठने और विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं: दूर-दराज से भूखे-प्यासे सफर तय करके आने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर न तो बैठने के लिए पर्याप्त बेंच हैं और न ही पेयजल व छांव की उचित व्यवस्था। नतीजतन, कई महिलाएं चक्कर खाकर जमीन पर ही गिर जाती हैं।

मरीजों और तीमारदारों का छलका दर्द

अस्पताल परिसर में अपनी पत्नी को लेकर पहुँचे एक ग्रामीण तीमारदार ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि, "हम सुबह 6 बजे से लाइन में खड़े हैं, लेकिन दोपहर के 1 बजे तक भी पर्चा नहीं कटा है। डॉक्टर साहब कहते हैं कि आज का कोटा पूरा हो गया है, कल आना। गरीब आदमी प्राइवेट में जांच करा नहीं सकता, और सरकारी अस्पताल में इस तरह की जिल्लत उठानी पड़ती है।"

विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान समय पर अल्ट्रासाउंड कराना जच्चा और बच्चा दोनों की सुरक्षा के लिए बेहद अनिवार्य होता है। यदि समय पर जांच न हो सके, तो किसी भी आपात स्थिति का समय पर पता लगाना असंभव हो जाता है, जिससे कई बार माताओं और नवजात शिशुओं की जान पर बन आती है। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन इस दिशा में कोई ठोस और स्थायी कदम उठाने में विफल साबित हो रहा है।

निजी जांचघरों की चांदी, गरीब मरीज हो रहे आर्थिक शोषण का शिकार

सरकारी अस्पताल में व्याप्त इन लंबी कतारों और अव्यवस्थाओं का सबसे बड़ा फायदा शहर के निजी डायग्नोस्टिक सेंटर और बिचौलिए (दलाल) उठा रहे हैं। अस्पताल के गेट के बाहर सक्रिय रहने वाले ये दलाल महिलाओं और उनके परिजनों को यह झांसा देकर बहला लेते हैं कि "सरकारी में आज नंबर नहीं आएगा, बाहर निजी लैब में तुरंत और सस्ते में अल्ट्रासाउंड करा लो।" मजबूरी में गरीब मरीजों को अपनी खून-पसीने की कमाई कर्ज लेकर इन प्राइवेट सेंटरों पर लुटानी पड़ती है, जहाँ मनमाने दाम वसूले जाते हैं।

अधिकारियों के दावों और धरातल की सच्चाई में भारी अंतर

समय-समय पर जिला प्रशासन और अस्पताल अधीक्षक द्वारा मायागंज अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल देती है। मशीनों की कमी नहीं होने के बावजूद ऑपरेटरों की सुस्ती, प्रबंधन की लचर कार्यशैली और मॉनिटरिंग के अभाव के कारण जांच का दायरा सीमित रह जाता है, जिससे मरीजों की भीड़ लगातार बढ़ती जाती है।

भागलपुर के मायागंज अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने आई महिलाओं की यह दुर्दशा स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता का एक जीता-जागता उदाहरण है। यदि अस्पताल प्रशासन ने जल्द ही काउंटर की संख्या बढ़ाने, टोकन प्रणाली को पारदर्शी करने और गर्भवती महिलाओं के बैठने व विश्राम के लिए उचित व्यवस्था करने जैसे कदम नहीं उठाए, तो यह अव्यवस्था और अधिक गंभीर रूप ले सकती है। मरीजों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि किसी भी महिला को इलाज के अभाव में इस प्रकार की अमानवीय पीड़ा न सहनी पड़े।