बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर: उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद भिजवाकर सम्राट चौधरी सरकार में बचाया मंत्री पद

पटना: बिहार की सियासत एक बार फिर बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) ने अपनी राजनीतिक कुशलता और पैंतरेबाजी से एक बार फिर सभी को चौंका दिया है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के तहत, उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश (Deepak Prakash) को विधान पार्षद (MLC) बनवाकर सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उनके मंत्री पद को फिलहाल अगले साल मार्च तक के लिए पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है। हालांकि, पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि एक तरफ जहां भाजपा लगातार छोटे दलों का अपने पाले में विलय कराने का दबाव बना रही है, वहीं दूसरी तरफ उपेंद्र कुशवाहा इस राजनीतिक दबाव के बीच अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं। जानकारों का मानना है कि दीपक प्रकाश के इस मनोनयन के बाद अब से लेकर सात महीने बाद की राजनीति ही यह तय करेगी कि उपेंद्र कुशवाहा का अगला कदम क्या होगा और बिहार के राजनीतिक गलियारों में उनके समीकरण किस करवट बैठेंगे।

संकट में था मंत्री पद: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और विधान परिषद का दांव

दीपक प्रकाश को बिना किसी सदन की सदस्यता के लगातार मंत्री पद पर बनाए रखने को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर था और मामला अदालत तक पहुंच चुका था।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी पूछताछ: संविधान के नियमों के अनुसार कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या विधान पार्षद बने अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। दीपक प्रकाश ने जब नवंबर 2025 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में और बाद में मई 2026 में सम्राट चौधरी की सरकार में मंत्री पद की शपथ ली, तब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सम्राट चौधरी सरकार से जवाब तलब किया था। कोर्ट की अगली सुनवाई से ठीक पहले सरकार पर कानूनी संकट मंडराने लगा था

भाजपा नेता का इस्तीफा और रास्ता साफ: इस कानूनी संकट से उबारने के लिए भाजपा ने बड़ा कदम उठाया। राज्यपाल कोटे से विधान पार्षद रहे भाजपा नेता देवेश कुमार ने अपने कार्यकाल (जो मार्च 2027 तक था) से पहले ही अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट पर राज्यपाल की मुहर लगने के बाद दीपक प्रकाश को आधिकारिक रूप से विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया, जिससे उनका मंत्री पद फिलहाल सुरक्षित हो गया है।

विलय का अघोषित दबाव और एनडीए के भीतर आंतरिक खींचतान

एक तरफ जहां उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य और मंत्री पद बचाने में कामयाब रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एनडीए के भीतर उनके राजनीतिक वजूद को लेकर सुगबुगाहट तेज है।

पार्टी के विलय का दबाव: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) बिहार में अपने सहयोगियों को साधने के साथ-साथ छोटे दलों के अस्तित्व को अपने अंदर मिलाने की रणनीति पर काम कर रही है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 'रालोमो' पर भी लगातार यह अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जा रहा है कि वे अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर लें।

कुशवाहा की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान: उपेंद्र कुशवाहा भली-भांति जानते हैं कि यदि उन्होंने अपनी पार्टी का पूरी तरह विलय कर दिया, तो उनकी धमक और सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) कम हो जाएगी। यही वजह है कि वे तमाम वार्ताओं और दबावों के बावजूद अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन छोड़ने से बचते नजर आ रहे हैं। बेटे को मंत्री पद दिलवाना और अब उसे विधान परिषद में पहुंचाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है ताकि पार्टी के भीतर उनका रसूख कायम रहे।

मार्च 2027 का अंकगणित: क्यों खास हैं आने वाले सात महीने?

दीपक प्रकाश वर्तमान में जिस विधान परिषद सीट से मनोनीत होकर पहुंचे हैं, उसका मूल कार्यकाल अगले साल यानी मार्च 2027 तक ही है। यही कारण है कि आगामी सात महीने बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।

सीमित समय का लाभ और चुनौती: चूँकि यह कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त हो रहा है, इसलिए दीपक प्रकाश को अपनी राजनीतिक निरंतरता बनाए रखने के लिए आने वाले समय में फिर से जद्दोजहद करनी होगी।

भविष्य की राजनीतिक चालें: अगले सात महीनों के भीतर बिहार के राजनीतिक समीकरण, एनडीए के भीतर सीटों के तालमेल और छोटे दलों की उपयोगिता पर बड़े फैसले हो सकते हैं। उपेंद्र कुशवाहा इस दौरान अपनी पार्टी के जनादेश और कोयरी-कुशवाहा वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए कई नए सियासी दांव चल सकते हैं।

उपेंद्र कुशवाहा द्वारा अपने बेटे दीपक प्रकाश को विधान पार्षद की कुर्सी तक पहुंचाकर मार्च तक के लिए मंत्री पद बचा लेना उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता का परिणाम जरूर है, लेकिन यह राह आसान नहीं है। भाजपा की ओर से लगातार मिल रहे विलय के दबाव और बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच आने वाले सात महीनों का यह सफर तय करेगा कि उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के भीतर अपनी स्वतंत्र और मजबूत हैसियत बनाए रख पाते हैं या उन्हें किसी बड़े राजनीतिक समझौते के लिए मजबूर होना पड़ता है। बिहार की सियासत में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कुशवाहा अपनी इस राजनीतिक चाल के बाद आगे क्या नया पासा फेंकते हैं।