बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन करने वाले शिक्षकों को नहीं मिलेगा यात्रा और ठहराव भत्ता, फंड की कमी के चलते नई व्यवस्था लागू
मुजफ्फरपुर। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) प्रशासन ने परीक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जिसका सीधा असर उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने वाले शिक्षकों पर पड़ेगा। विश्वविद्यालय ने तत्काल प्रभाव से नई व्यवस्था लागू करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब मूल्यांकन कार्य के लिए आने वाले शिक्षकों को परिवहन, यात्रा (टीए) और ठहराव (डीए/हॉल्टिंग) भत्ता नहीं दिया जाएगा। इस संबंध में कुलपति के निर्देश पर परीक्षा नियंत्रक की ओर से बुधवार को आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि वित्तीय संसाधनों की कमी को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। वहीं दूसरी ओर इस फैसले से शिक्षकों में नाराजगी देखी जा रही है और वे इस पर विरोध दर्ज कराने की तैयारी में हैं।
विश्वविद्यालय के अनुसार यह नई व्यवस्था स्नातक तृतीय सेमेस्टर की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से ही प्रभावी मानी जाएगी। यानी जो शिक्षक मूल्यांकन केंद्रों पर कॉपियों की जांच करने पहुंचेंगे, उन्हें अब पहले की तरह आने-जाने या ठहरने का कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलेगा। इससे उन शिक्षकों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है, जो दूर-दराज के कॉलेजों से मूल्यांकन केंद्रों तक आते हैं।
बीआरए बिहार विश्वविद्यालय हर वर्ष विभिन्न स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षाओं के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों की सेवाएं मूल्यांकन कार्य में लेता है। मूल्यांकन प्रक्रिया को समय पर पूरा करने के लिए अलग-अलग जिलों और संबद्ध कॉलेजों के शिक्षकों को विभिन्न मूल्यांकन केंद्रों पर तैनात किया जाता है। अब तक ऐसे शिक्षकों को निर्धारित नियमों के अनुसार यात्रा और ठहराव से संबंधित भत्ते दिए जाते थे, जिससे उनके अतिरिक्त खर्च की आंशिक भरपाई हो जाती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह सुविधा समाप्त कर दी गई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि हाल के वर्षों में वित्तीय दबाव लगातार बढ़ा है। परीक्षा संचालन, उत्तर पुस्तिका छपाई, मूल्यांकन, डिजिटल रिकॉर्ड, परिणाम प्रकाशन और अन्य प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि के कारण उपलब्ध बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है। इसी पृष्ठभूमि में खर्चों में कटौती के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि सीमित संसाधनों के भीतर परीक्षा प्रणाली को नियमित रूप से संचालित करने के लिए कुछ कठिन प्रशासनिक निर्णय लेने पड़ रहे हैं।
हालांकि इस निर्णय से शिक्षकों के बीच असंतोष बढ़ गया है। कई शिक्षकों का कहना है कि मूल्यांकन कार्य केवल शैक्षणिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि समय और संसाधनों की भी मांग करता है। दूरस्थ महाविद्यालयों से आने वाले शिक्षकों को परिवहन और कई बार ठहरने पर भी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में यदि भत्ते की व्यवस्था समाप्त कर दी जाती है, तो उन्हें आर्थिक रूप से अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा।
कुछ शिक्षकों का यह भी कहना है कि मूल्यांकन कार्य पहले से ही समयबद्ध और दबावपूर्ण होता है। यदि आवश्यक सुविधाओं में कटौती की जाएगी, तो इससे शिक्षकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय को खर्च कम करने के लिए अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए था, न कि सीधे शिक्षकों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती करनी चाहिए।
शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने संकेत दिया है कि वे इस निर्णय पर विश्वविद्यालय प्रशासन से बातचीत करेंगे। यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार नहीं किया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज करा सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी औपचारिक आंदोलन की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन विभिन्न कॉलेजों के शिक्षकों के बीच इस विषय पर लगातार चर्चा हो रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता काफी हद तक समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण मूल्यांकन पर निर्भर करती है। यदि मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े शिक्षकों की सुविधाओं में कमी आती है, तो इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव परीक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन को वित्तीय अनुशासन और शिक्षकों की व्यावहारिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेना चाहिए।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट किया गया है कि नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू होगी और स्नातक तृतीय सेमेस्टर की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से इसका पालन किया जाएगा। परीक्षा नियंत्रक कार्यालय ने संबंधित मूल्यांकन केंद्रों और कॉलेजों को भी इस संबंध में आवश्यक निर्देश भेज दिए हैं।
छात्रों के बीच भी इस निर्णय को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि इसका सीधा प्रभाव छात्रों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन कई छात्रों का मानना है कि मूल्यांकन प्रक्रिया समय पर और निष्पक्ष तरीके से पूरी होना सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी प्रशासनिक निर्णय से मूल्यांकन कार्य प्रभावित होता है, तो परिणाम घोषित होने में देरी की आशंका भी बढ़ सकती है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि वित्तीय संकट के दौरान संस्थानों को खर्चों की समीक्षा करनी पड़ती है, लेकिन ऐसे निर्णय लेते समय सभी हितधारकों की राय लेना भी आवश्यक होता है। इससे विवाद की संभावना कम होती है और निर्णयों को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है।
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन अपने फैसले पर कायम है, जबकि शिक्षकों में नाराजगी बनी हुई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शिक्षक संगठन इस मुद्दे पर क्या रणनीति अपनाते हैं और क्या विश्वविद्यालय प्रशासन भविष्य में इस निर्णय पर पुनर्विचार करता है। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद होता है, तो कोई व्यावहारिक समाधान भी निकल सकता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विश्वविद्यालय परिसर में प्रमुख चर्चा का विषय बना रह सकता है।